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Home»छत्तीसगढ़»बल्गारिया से डॉ. मौना कौशिक का साहित्यिक पैग़ाम , छत्तीसगढ़ के नाम
छत्तीसगढ़

बल्गारिया से डॉ. मौना कौशिक का साहित्यिक पैग़ाम , छत्तीसगढ़ के नाम

nimbletech.developer@gmail.comBy nimbletech.developer@gmail.comMarch 18, 2026No Comments10 Mins Read
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डॉ. मौना कौशिक ( प्रवासी साहित्यकार )
सोफिया यूनिवर्सिटी बल्गारिया, यूरोप

डॉ.मीनकेतन प्रधान – संस्थापक विश्व हिन्दी अधिष्ठान रायगढ़ ( छत्तीसगढ़)द्वारा आयोजित बिलासपुर कार्यक्रम में उपस्थित डॉ. मौना कौशिक ( प्रवासी साहित्यकार ) बल्गारिया का संस्मरणात्मक आलेख।

सर्वप्रथम सभी विद्वज्जनों से क्षमा चाहती हूँ कि आप लोगों के सानिध्य में 25/2/26 को बिलासपुर में सम्पन्न कार्यक्रम विषयक साहित्यिक संस्मरण
ऐतिहासिक महत्त्व के कार्यक्रम और मेरी साहित्यिक यात्रा का संस्मरण कुछ विलंब से लिख पा रही हूँ।विश्व हिन्दी अधिष्ठान रायगढ़ के तत्वावधान में बिलासपुर में संयोजित इस आयोजन का ऐतिहासिक महत्त्व है ।भारत से बुल्गारिया लौटने की मेरी यात्रा के बीच कुछ और यात्राएँ भी जुड़ गईं, इसलिए वर्तमान वैश्विक घटना चक्र के मद्देनज़र शांतिपूर्वक यहाँ पहुँचने में थोड़ा समय लग गया।
भारत में साहित्यिक परिभ्रमण के दौरान बिलासपुर के गौरवशाली साहित्यिक आयोजन में आप सबसे जो स्नेह, शुभकामनाएँ और आत्मीय संदेश प्राप्त हुए, उसके लिए मैं हृदय से आभारी हूँ।
उक्त संयुक्त आयोजन—
डॉ. विनय कुमार पाठक के मार्गदर्शन, डॉ. मीनकेतन प्रधान- संस्थापक विश्व हिन्दी अधिष्ठान रायगढ़ (छ.ग.), डॉ. ज्ञानेश्वरी सिंह – महासचिव –
भाषा सहोदरी हिन्दी समिति, दिल्ली,देवम् फाऊंडेशन,
सोफिया,बुल्गारिया, यूरोप,
डॉ. राघवेंद्र दुबे -प्रयास प्रकाशन,साहित्य अकादमी,बिलासपुर(छग) तथा अंजनी कुमार तिवारी सुधाकर- अध्यक्ष
-राष्ट्रीय कवि संगम मंच,बिलासपुर के संयुक्त तत्वावधान में दिनांक-25फरवरी 2026 को बिलासपुर के संस्कार भवन में सम्पन्न हुआ। जिसमें अधिष्ठान द्वारा प्रकाशित चिरंजीव राव की काव्य कृति- ‘बाग- जलियाँवाला’ का विमोचन तथा मेरा सम्मान कार्यक्रम अत्यंत गौरवपूर्ण रहा ।
सच कहूँ तो उक्त आयोजन में इतनी आत्मीयता मिली कि लेखनी के शब्द कम पड़ जाते हैं और आँखों में कृतज्ञता के आँसू भर आते हैं। बुल्गारिया से बिलासपुर की यह यात्रा वास्तव में लंबी और अनुभवों से भरी रही।
एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लेने के लिए मुझे बिलासपुर पहुँचना था। जब छत्तीसगढ़ आने का अवसर मिला, तो यह कैसे संभव था कि विश्व हिन्दी अधिष्ठान के संस्थापक और मार्गदर्शक प्रो. मीनकेतन प्रधान जी से भेंट न हो। मन में उनसे मिलने की स्वाभाविक इच्छा थी।इसी भावना के साथ पहले यह तय हुआ था कि वे रायगढ़ में यह कार्यक्रम 26/2/26 को रखेंगे ताकि डॉ. विनय कुमार पाठक प्रवास से लौटकर उपलब्ध हो सकें। मेरे लिए भी 25/2/26 को शाम तक बिलासपुर पहुंचने और 26 को इत्मीनान से कार्यक्रम में सम्मिलित होने की सुविधा थी। किन्तु श्री चिरंजीव राव जी की अपरिहार्य धार्मिक स्थिति के कारण उक्त आयोजन को एक दिन पूर्व रायगढ़ के स्थान पर बिलासपुर में 25/2/26 को रखना पड़ा।यह तय हुआ कि कवि श्री चिरंजीव राव इच्छापुरम (आंध्रप्रदेश) से रायगढ़ आयेंगे तथा रायगढ से उनको साथ लेकर डॉ. मीनकेतन प्रधान, डॉ. विद्या प्रधान , पंकज रथ शर्मा सायं 5 बजे तक बिलासपुर पहुँचेंगे।हुआ भी वैसा ही ।इस प्रकार मेरी यात्रा के साथ एक सुंदर साहित्यिक उद्देश्य जुड़ गया। मेरे लिए बिलासपुर के एक अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन के अलावा एक प्रकार से साहित्यिक आत्मीयता और संवाद का यह सुखद अवसर था । जब किसी विद्वान से केवल नाम या आभासी मंचों के माध्यम से परिचय हो और फिर उनसे प्रत्यक्ष मिलने का अवसर मिले, तो उसमें एक अलग ही उत्सुकता और आनंद होता है। बुल्गारिया से मेरा दिल्ली पहुँचना और वहाँ से बिलासपुर की ओर बढ़ना अत्यंत रोमांचकारी था। रास्ते भर उत्साह और जिज्ञासाओं से मेरे मन का इंद्रधनुषी आकाश खींचे जा रहा था ।यह केवल एक औपचारिक भेंट नहीं थी, बल्कि हिन्दी साहित्य और उसके वैश्विक प्रसार से जुड़े विचारों, अनुभवों और आत्मीयता को साझा करने का एक सुंदर अवसर था।
दिल्ली के इंदिरा गांधी एयरपोर्ट से लगभग दो घंटे की उड़ान के बाद हम रायपुर के स्वामी विवेकानंद एयरपोर्ट पहुँचे । वहाँ से सड़क मार्ग द्वारा बिलासपुर पहुंचने में हमें 3 घंटे से अधिक लगे। यात्रा के दौरान मीनकेतन प्रधान जी से निरंतर संपर्क बना रहा। कार्यक्रम की रूपरेखा बनती और बदलती रही, और अंततः यह तय हुआ कि मैं सीधे समारोह स्थल पर पहुँचूँ।
प्रोफेसर शशिबाला जी और डॉ. आशा पांडेय जी के साथ जैसे ही हम समारोह स्थल पर पहुँचे, मुझे तुरंत कार्यक्रम स्थल की ओर ले जाया गया और अन्य साथी अपने गंतव्य की ओर बढ़ गए। बिलासपुर के संस्कार भवन समारोह स्थल के गेट के पास पहुँचते ही हमें डॉ. मीनकेतन प्रधान, चिरंजीव राव , पंकज शर्मा,डॉ, राघवेंद्र दुबे , अंजनी तिवारी सुधाकर मिले ।वे हमारे इंतज़ार में वहां खड़े थे ।हमें देखकर वे सभी पुलकित हो गये ।
स्थल में पहुँचने पर सबसे पहले मुझे डॉ. विद्या प्रधान मिलीं । वे मेरा इंतज़ार कर रही थीं । वहाँ छत्तीसगढ़ के अनेक प्रतिष्ठित लेखक, कवि और गणमान्य साहित्यकारों की उपस्थिति देखकर मन अत्यंत प्रसन्न हो उठा। मुझे स्मरण है आयोजन के मुख्य अतिथि न्यायमूर्ति डॉ. चन्द्रभूषण वाजपेयी- पूर्व कुलपति हिदायतुल्ला नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, रायपुर सहित
डॉ. राघवेंद्र दुबे, डॉ. विनोद वर्मा,अंजनी तिवारी सुधाकर ,
कवि चिरंजीव राव ,डॉ .विवेक तिवारी,डॉ .शत्रुघ्न जेसवानी,राजेश कुमार सोनार, शीतल प्रसाद पाटनवार, राम निहोरा राजपूत, बालमुकुंद श्रीवास,श्रीमती कामना पाण्डेय,श्रीमती सुषमा पाठक,श्रीमती मीना दुबे,महेन्द्र दुबे,दीपक दुबे, पंकज शर्मा एवं अन्य साहित्यकारों से पहले बारी बारी से परिचय हुआ ।
वहाँ उपस्थित साहित्यिक वातावरण में एक विशेष गरिमा और आत्मीयता का भाव था। हमारे कई साथी पहले से ही आभासी मंचों के माध्यम से परिचित थे, किंतु उनसे प्रत्यक्ष मिलना एक अलग ही आनंद और अपनापन लेकर आया। आयोजन में , मुख्य रुप से
मीनकेतन प्रधान जी की वाणी में वास्तव में सरस्वती का वास है। उनके शब्दों में ज्ञान के साथ-साथ संवेदना, सौम्यता और गहरी साहित्यिक दृष्टि भी स्पष्ट झलकती है। हमारे मंच, विश्व हिन्दी अधिष्ठान , के लिए यह अत्यंत गौरव की बात है कि ऐसा विद्वान व्यक्तित्व इसका संस्थापक और संरक्षक है। उनके मार्गदर्शन और साहित्यिक दृष्टि ने मंच को व्यापक और सम्मानित पहचान प्रदान की है।
उनकी धर्मपत्नी डॉ. विद्या प्रधान भी उनके व्यक्तित्व की इस शक्ति की सशक्त सहचरी हैं। वे केवल सहयोगी ही नहीं, बल्कि स्वयं एक विदुषी और सुसंस्कृत व्यक्तित्व की धनी हैं। उनके व्यवहार में जो गरिमा, सरलता और आत्मीयता दिखाई देती है, वह मन को तुरंत छू लेती है। रायगढ़ से बिलासपुर की तीन घंटे से अधिक की लंबी यात्रा के बाद भी उनके चेहरे पर जो स्मितपूर्ण, शांत और आत्मीय मुस्कान थी, वह आज भी स्मृति में सजीव है।
आयोजन मुख्य रूप से कवि चिरंजीव राव की काव्यकृति – बाग -जलियाँवाला के विमोचन और मेरे सम्मान पर केंद्रित था । दूसरे चरण में हिन्दी-छत्तीसगढ़ी काव्य पाठ हुआ ।
आयोजन में ‘मुकुटधर पाण्डेय सम्मान’ से सम्मानित होना मेरे लिए अत्यंत गौरवपूर्ण और हृदयस्पर्शी क्षण था । छायावाद के प्रवर्तक माने जाने वाले ऐसे महान् साहित्यकार के नाम पर प्राप्त यह सम्मान न केवल मेरे लिए, बल्कि मेरे समूचे साहित्यिक संस्कारों के लिए भी विशेष महत्त्व रखता है। मेरे स्वर्गीय पिता जी डॉ. रामकृष्ण कौशिक जी की पी-एच.डी . शोधकार्य सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ पर केंद्रित था। हमारे घर का वातावरण साहित्य, विशेषकर छायावादी काव्यधारा की संवेदनाओं से ओतप्रोत रहा। वास्तव में, हम छायावाद की छाया में ही पले-बढ़े हैं।
ऐसे में “मुकुटधर पांडेय सम्मान” प्राप्त करना मेरे लिए केवल एक पुरस्कार नहीं, बल्कि अपनी साहित्यिक परंपरा और पारिवारिक संस्कारों से जुड़ा अत्यंत भावपूर्ण क्षण है। इस सम्मान को मैं विनम्रतापूर्वक अपने स्वर्गीय पिता जी की पावन स्मृति को समर्पित करती हूँ। उनके मार्गदर्शन, साहित्य-प्रेम और दिए गए संस्कार मेरे लिए सदैव प्रेरणा के स्रोत रहे हैं।आदरणीय चिरंजीव राव जी से मिलना मेरे लिए अत्यंत प्रेरणादायक अनुभव रहा। वे मूलतः आंध्र प्रदेश से हैं। उनसे मिलते ही मुझे अपने पिताजी डॉ. रामकृष्ण कौशिक जी के परम मित्र, स्वर्गीय बालशौरि जी की स्मृति सहज ही हो आई। उनकी आत्मीयता, सहजता और स्नेहिल व्यवहार ने पुराने पारिवारिक संबंधों की याद को पुनः जीवंत कर दिया। ऐसा प्रतीत हुआ कि साहित्य और संस्कारों की एक पुरानी धारा वर्तमान में फिर से प्रवाहित हो उठी है। कभी-कभी जीवन में कुछ मुलाकातें केवल औपचारिक नहीं रहतीं, वे स्मृतियों और भावनाओं के कई पुराने द्वार खोल देती हैं। उस क्षण मुझे अनुभव हुआ कि पीढ़ियों के बीच जो आत्मीय संबंध और साहित्यिक संस्कार चलते आते हैं, वही हमें एक अदृश्य सूत्र में बाँधे रखते हैं। उनकी सरलता, सहजता और विद्वता को मैं सादर प्रणाम करती हूँ। वे अत्यंत विशाल साहित्यिक व्यक्तित्व के धनी हैं, किंतु उनके व्यवहार में अद्भुत विनम्रता और मृदुता है। उनके साथ मंच साझा करना मेरे लिए एक सौभाग्यपूर्ण क्षण था।
कार्यक्रम के दौरान उनकी कृति का विमोचन और साहित्यिक संवाद का वातावरण अत्यंत प्रेरणादायक था। ऐसा प्रतीत हुआ मानो शब्द, संवेदना और विचार एक साथ मिलकर एक सुंदर साहित्यिक उत्सव का रूप ले रहे हैं।न्यायमूर्ति डॉ.वाजपेयी जी के व्यक्तित्व में जो बौद्धिक और अकादमिक भव्यता है वह आज के समय में दुर्लभ है । डॉ. विनोद वर्मा हिन्दी छत्तीसगढ़ी साहित्य के प्रखर विद्वान हैं और अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित हैं , आयोजन में वे विशिष्ट अतिथि थे।उन्होंने अपनी बहुचर्चित राष्ट्रीय स्तर की कहानी पुस्तक ‘ मछुआरे की लड़की ‘ मुझे भेंट की । जिसे मैं बल्गारिया लेकर आयी हूँ ।प्रोफेसर प्रधान जी का आग्रह है कि मैं बल्गारियन भाषा में इसका अनुवाद करुं।वहाँ मंच में संचालक डॉ. राघवेंद्र दुबे जी ने जिस गरिमापूर्ण भाषा-शैली में मेरा परिचय देते हुए वक्तव्य के लिए आमंत्रित किया वह अविस्मरणीय रहेगा । श्री अंजनी तिवारी सुधाकर जी का गंभीर व्यक्तित्व उनकी विद्वता का परिचायक है ।डॉ. शत्रुघ्न, श्री पाटनवार ,श्री रामनिहोरा , डॉ. विवेक तिवारी की साहित्यिक समर्पणशीलता अवर्णनीय है ।सुषमा पाठक,राजेश कुमार सोनार, बालमुकुंद श्रीवास,श्रीमती कामना पाण्डेय,श्रीमती मीना दुबे,महेन्द्र दुबे,दीपक दुबे और पंकज शर्मा की कविताओं को सुनकर लगा कि छत्तीसगढ़ की धरती वास्तव में धान का कटोरा है ।यह मैंने सुना था जो सच साबित हुआ । कार्यक्रम में डॉ विद्या प्रधान के धन्यवाद ज्ञापन में औपचारिकता कहीं नहीं थी। वे मन से अपनी बात कह रहीं थीं ।प्रिय पंकज का उल्लेख खास तौर पर करना चाहूँगी कि वे छत्तीसगढ़ी में लिखने वाले प्रतिभाशाली युवा कवि हैं और साथ ही उत्कृष्ट आयोजक भी हैं। उनकी ऊर्जा, सक्रियता और साहित्य के प्रति समर्पण पूरे कार्यक्रम में स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो रहा था। अतिथियों का ध्यान रखना, उनके आवागमन और सुविधाओं की व्यवस्था करना, कार्यक्रम के छोटे-छोटे विवरणों पर सतत दृष्टि बनाए रखना—इन सभी कार्यों को वे सहजता और प्रसन्नता के साथ संभाल रहे थे। किसी भी सफल आयोजन के पीछे कुछ ऐसे लोग होते हैं जो मंच पर कम दिखाई देते हैं, किंतु जिनकी मेहनत और सजगता पूरे कार्यक्रम को सुचारु और गरिमामय बनाती है। पंकज ऐसे ही समर्पित युवाओं में से एक हैं। उनकी विनम्रता और कर्मठता देखकर यह विश्वास और भी दृढ़ होता है कि नई पीढ़ी हिन्दी और अपनी क्षेत्रीय भाषाओं की साहित्यिक परंपरा को उत्साह और जिम्मेदारी के साथ आगे बढ़ा रही है।
पूरी संध्या भावनाओं की ऐसी अविरल धारा बन गई कि जितना भी लिखूँ, वह कम ही प्रतीत होता है। साहित्य के प्रति समर्पण, आपसी सम्मान और आत्मीयता की जो अनुभूति उस दिन हुई, वह सदैव स्मृतियों में जीवित रहेगी।बिलासपुर की यह यात्रा मेरे लिए केवल एक कार्यक्रम नहीं , बल्कि साहित्यिक आत्मीयता, सांस्कृतिक संवाद और मानवीय संबंधों का अत्यंत सुंदर अनुभव बन गई।अफसोस यह कि आदरणीय डॉ. विनय कुमार पाठक जी के साहित्यिक प्रवास में होने के कारण उनसे भेंट नहीं हो सकी ।
संदर्भगत यहाँ एक आत्मीय प्रसंग का उल्लेख भी करना चाहूँगी। गत वर्ष मेरी बेटी ,अपनी छत्तीसगढ़ यात्रा के दौरान मेरे लिए विशेष रूप से वहाँ का स्थानीय रेशमी परिधान ले कर बुल्गारिया आयी थी
,जिसका महत्त्व मेरे लिए केवल वस्त्र ही नहीं बल्कि भावनात्मक स्मृति के रूप में भी है। इससे मुझे छत्तीसगढ़ की संस्कृति, उसकी मिट्टी की महक और हिन्दी साहित्य की आत्मीय परंपरा से जुड़े होने का बोध होता है। भावनाओं के इसी सांस्कृतिक हस्तांतरण से विश्व मानवता सम्पोषित होती है। जिसकी गहरी अनुभूति उक्त 25/2/26 के बिलासपुर आयोजन में मुझे हुई ।
एक बार पुनः, मैं सभी विद्वज्जनों, मित्रों और शुभचिंतकों का हृदय से धन्यवाद करती हूँ, जिनके स्नेह और सहयोग से यह अवसर और भी स्मरणीय बन गया।

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