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Home»छत्तीसगढ़»अरपा की करुण पुकार: दोहरी मार के बीच दम तोड़ती जीवन दायिनी जीवनरेखा
छत्तीसगढ़

अरपा की करुण पुकार: दोहरी मार के बीच दम तोड़ती जीवन दायिनी जीवनरेखा

nimbletech.developer@gmail.comBy nimbletech.developer@gmail.comMay 4, 2026No Comments5 Mins Read
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सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’

छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक राजधानी बिलासपुर की पहचान रही अरपा नदी आज अपने अस्तित्व के सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। कभी “अंतःसलिला” के रूप में जीवनदायिनी रही यह नदी आज दोहरी मार—प्रदूषण और जलकुंभी—के बोझ तले कराह रही है। दोमुहानी से शिवघाट तक फैली जलकुंभी केवल हरियाली नहीं, बल्कि एक गंभीर पारिस्थितिक संकट का संकेत है।
अरपा का उद्गम मैकल पर्वत की वनांचल वादियों से होता है। यह नदी केवल जलधारा नहीं, बल्कि सदियों से जनजीवन, आस्था और अर्थव्यवस्था की धुरी रही है। 147 किलोमीटर की अपनी यात्रा में यह अनेक गांवों और कस्बों को जीवन देती आई है। इसकी विशेषता रही है कि गर्मियों में सतह पर सूखी दिखने के बावजूद इसकी जलधारा रेत के नीचे निरंतर बहती रहती है—यही कारण है कि इसे “अंतःसलिला” कहा जाता है।
लेकिन बदलते समय ने इस नदी की पहचान को संकट में डाल दिया है। 1980-90 के दशक तक स्वच्छ और उपयोगी मानी जाने वाली अरपा आज शहरीकरण, अतिक्रमण और लापरवाही की शिकार हो चुकी है। शहर के लगभग 70 नालों का गंदा पानी बिना उपचार के इसमें समाहित हो रहा है, जो न केवल जल को विषैला बना रहा है, बल्कि नदी के प्राकृतिक प्रवाह को भी बाधित कर रहा है।
स्थिति की गंभीरता को समझने के लिए जलकुंभी के विस्तार को देखना पर्याप्त है। यह जलकुंभी नदी की सतह पर मोटी परत बनाकर सूर्य के प्रकाश और ऑक्सीजन को नीचे जाने से रोकती है, जिससे जलीय जीव दम तोड़ रहे हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो जहां सामान्य स्थिति में एक लीटर पानी वाष्पित होता है, वहीं जलकुंभी की उपस्थिति में यह मात्रा दस गुना तक बढ़ जाती है। यानी यह नदी को “सूखाने” का भी काम कर रही है।


विडंबना यह है कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद सीवेज ट्रीटमेंट की व्यवस्था केवल कागजों में सिमटी हुई है। करोड़ों रुपए की योजनाएं बनीं, ठेके दिए गए, मशीनें मंगाई गईं—लेकिन जमीनी हकीकत में मात्र 11 किलोमीटर में से 800 मीटर की सफाई ही हो सकी। यह आंकड़ा केवल प्रशासनिक उदासीनता नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक विफलता का प्रमाण है।
अरपा केवल एक नदी नहीं, बल्कि आस्था का केंद्र भी है। पितृ पक्ष में यहां तर्पण की परंपरा, छठ पूजा और मकर संक्रांति जैसे पर्व इसकी सांस्कृतिक जीवंतता को दर्शाते हैं। लोककथाओं में इसे देवी स्वरूप माना गया है, जो विपरीत परिस्थितियों में भी जीवन देती रहती हैं। लेकिन आज वही जीवनदायिनी नदी अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है।
इतिहास गवाह है कि अरपा के तटों पर बसे जूना बिलासपुर के डोंगाघाट कभी व्यापारिक गतिविधियों के केंद्र हुआ करते थे। यहां से धान, कोदो, कुटकी, महुआ और अन्य उत्पादों का आदान-प्रदान होता था। यह नदी केवल जल नहीं, बल्कि समृद्धि की धारा भी बहाती थी। आज वही तट प्रदूषण और उपेक्षा के प्रतीक बनते जा रहे हैं।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि नदी का प्रदूषण अब भूजल को भी प्रभावित कर रहा है। यानी संकट केवल नदी तक सीमित नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के जल स्रोतों पर भी मंडरा रहा है।
प्रशासन की ओर से एसटीपी निर्माण और सफाई के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या ये प्रयास समय रहते प्रभावी हो पाएंगे? क्या हम केवल योजनाओं और घोषणाओं तक ही सीमित रहेंगे, या वास्तव में धरातल पर बदलाव देख पाएंगे?


आज जरूरत है केवल सरकारी प्रयासों की नहीं, बल्कि जनभागीदारी की। अरपा को बचाना केवल एक परियोजना नहीं, बल्कि एक जनआंदोलन होना चाहिए। जलकुंभी से खाद और ऊर्जा उत्पादन जैसे विकल्पों को अपनाकर इसे समस्या से समाधान में बदला जा सकता है।
स्व डॉ. पालेश्वर शर्मा की चिंता आज और भी प्रासंगिक हो उठती है—“कहीं अरपा केवल कहानियों में न रह जाए।” यह चेतावनी नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी है, जिसे हमें समझना होगा। अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियां अरपा को केवल किताबों और लोककथाओं में ही पढ़ेंगी। सवाल यह नहीं कि अरपा बचेगी या नहीं…?सवाल यह है कि क्या हम उसे बचाने के लिए जागेंगे? अरपा आज भी जीवित है रेत के नीचे, हमारी यादों में, और हमारी जिम्मेदारियों में। जरूरत है उसे फिर से सतह पर लाने की।

अरपा, तू केवल जलधारा नहीं
हमारी आत्मा की पुकार है,
अरपा नदी तेरे तटों पर बसता हर जन, तेरा ही उधार है।

रेत के नीचे भी बहती, तू जीवन की अमर कहानी,
सूखी आँखों में भी तेरी, झलकती रही निशानी।

पितरों का तर्पण, आस्था का अटूट यह सेतु,
हर लहर में बसता है विश्वास, हर कण में पावन हेतु।

पर आज तेरा दम घुटता, प्रदूषण की काली छाया में,
कौन सुनेगा तेरी पीड़ा इस शोर भरी माया में?

उठो, बचा लो इस जीवनधारा को, यह समय पुकारे,
कल न रह जाए अरपा केवल किस्सों के सहारे।

शाश्वत की विनती है,अब भी जागो, पहचानो जिम्मेदारी,
अरपा बचेगी तो बचेगी हमारी आत्मा, संस्कृति, हमारी सारी संस्कृति.. हमारी सारी।।

– सुरेश सिंह बैस,”शाश्वत”
बिलासपुर,छत्तीसगढ़

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