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Home»छत्तीसगढ़»22 मार्च विश्व जल दिवस पर विशेष-जल जीवन,कल
छत्तीसगढ़

22 मार्च विश्व जल दिवस पर विशेष-जल जीवन,कल

nimbletech.developer@gmail.comBy nimbletech.developer@gmail.comMarch 22, 2026No Comments5 Mins Read
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सुरेश सिंह बैस “शाश्वत” 22 मार्च 2026/पेयजल पृथ्वी पर कितनी अहम चीज है यह निम्न सर्वे से पता चल सकता है की पूरी पृथ्वी में पीने लायक जल की मात्रा केवल एक परसेंट से कुछ अधिक ही बची रह गई है। यह अत्यंत ही ज्वलंत और गंभीर मुद्दा है। और ये किसी एक देश की नहीं बल्कि वैश्विक दृष्टिकोण से गंभीर मसला है। जब हम जल पर सहयोग करते हैं तो हम एक सकारात्मक प्रभाव पैदा करते हैं। सद्भाव को बढ़ावा देना, समृद्धि पैदा करना और साझा चुनौतियों के प्रति लचीलापन बनाना भी हमारा अहम दायित्व बनता है। हमें इस एहसास के साथ काम करना चाहिए कि जल न केवल जीवनोपयोगी एक संसाधन है। अपितु एक मानव अधिकार भी है। जो हमारे जीवन के हर पहलू में शामिल है।
इस विश्व जल दिवस पर, हम सभी को पानी के लिए एकजुट होने और शांति के लिए पानी का उपयोग करने, एक अधिक स्थिर और समृद्ध कल की नींव रखने की जरूरत है।पानी शांति पैदा कर सकता है या संघर्ष भड़का सकता है। जब जल दुर्लभ या प्रदूषित होता है, या जब लोग जल तक पहुंचने के लिए संघर्ष करते हैं, तो तनाव बढ़ सकता है। जल पर सहयोग करके, हम हर किसी की जल की जरूरतों को संतुलित कर सकते हैं और दुनिया को स्थिर करने में मदद कर सकते हैं।
सभी की समृद्धि और शांति जल पर निर्भर है।जैसे-जैसे राष्ट्र जलवायु परिवर्तन, बड़े पैमाने पर प्रवासन और राजनीतिक अशांति का प्रबंधन करते हैं, उन्हें जल सहयोग को अपनी योजनाओं के केंद्र में रखना चाहिए। जल हमें संकट से बाहर निकाल सकता है। हम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलनों से लेकर स्थानीय स्तर पर कार्रवाई तक पानी के उचित और टिकाऊ उपयोग के लिए एकजुट होकर समुदायों और देशों के बीच सद्भाव को बढ़ावा दे सकते हैं।
क्या आप जानते हैं? कई करोड़ लोग अभी भी सुरक्षित रूप से स्वच्छ पेयजल के बिना रहते हैं, जिनमें 11.5 करोड़ लोग भी शामिल हैं जो सतही जल पीते हैं। दुनिया की लगभग आधी आबादी प्रत्येक वर्ष में कुछ महीनों में पानी की गंभीर कमी का सामना कर रही है।पिछले पचास वर्षों में आपदाओं की सूची में पानी से संबंधित आपदाएं हावी रही हैं।प्राकृतिक आपदाओं से संबंधित सभी मौतों में से सत्तर प्रतिशत के लिए पेयजल जिम्मेदार हैं।
दुनिया के ताजे पानी के प्रवाह में सीमा पार जल का योगदान 60 प्रतिशत है, और 153 देशों के पास 310 सीमा पार नदी और झील घाटियों में से कम से कम एक प्रतिशत का क्षेत्र है । 468 सीमा पार जलभृत प्रणालियां मौजूद हैं।
‌‌ केवल 24 देशों की रिपोर्ट है कि उनके सभी सीमा पार बेसिन सहयोग व्यवस्था के अंतर्गत आते हैं।जल संरक्षण और रखरखाव को लेकर दुनियाभर में लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए प्रतिवर्ष 22 मार्च को विश्व जल दिवस मनाया जाता है. आपने ये जरूर सुना होगा कि ‘जल ही जीवन है! जी हां यह परम सत्य है की जल ही जीवन है और जल है तो कल है वरना इस पृथ्वी पर कुछ भी नहीं बचेगा । जल मनुष्य और जीव-जंतुओं के लिए बेहद जरूरी है। खेती करनी हो, घर का काम करना हो, नहाना हो, पीना हो, उद्योग कल कारखाने आदि, इन सभी कामों के लिए जल बेहद जरूरी है।
हम हर साल देखते है पानी बचाने के लिए बड़े-बड़े अभियान चलाए जाते हैं जहां पानी को लेकर लोग और कई दिग्गज व्यक्तित्व अपने विचार रखते हैं, लेकिन क्या आप ये भी जानते हैं कि आखिर विश्व जल दिवस की शुरुआत कब हुई थी?
दरअसल 22 दिसंबर, 1992 को संयुक्त राष्ट्र असेंबली में प्रस्ताव लाया गया था, जिसमें ये घोषणा की गई कि 22 मार्च को विश्व जल दिवस के रूप में मनाया जाएगा. इसके बाद 1993 से दुनियाभर में 22 मार्च को विश्व जल दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।
पृथ्वी पर मौजूद सभी प्राणियों की उत्पत्ति जल से ही हुई है। अन्य ग्रहों पर भी वैज्ञानिकों द्वारा पानी की खोज को प्राथमिकता दी गयी है। . ‘जल ही जीवन है’ यह कथन सत्य है क्यूंकि पानी के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती।अधिकांश संस्कृतियों का विकास भी नदी किनारे हुआ है। पृथ्वी का 71 प्रतिशत हिस्सा पानी से ढका हुआ है। शेष भाग पर मानव, जीव जंतु, जंगल, मैदान पठार या पर्वत आदि मौजूद हैं। पृथ्वी का हर प्राणी जल पर निर्भरता रखता है।
आखिरकार विश्व में यह भी सत्य है की जल की कुल खपत में इजाफा हुआ है। क्योंकि उसी अनुपात में जल के पर्याप्त स्त्रोत सिकुड़ते जा रहे हैं या काम होते चले जा रहे हैं। नदियां, झील, तालाब पट रही है, सूख रही है। कुएं भी पटते चले जा रहे हैं। तो वहीं विश्व भर के ताजे पानी से और स्वच्छ जल से भरपूर जल पठार ( ग्लैसियर )भी सिकुड़ते जा रहे हैं और खत्म होते जा रहे हैं। जल( बर्फ) का विशाल भंडार अंटार्कटिका भी ग्लोबल वार्मिंग के चलते धीरे-धीरे सिकुड़ रहा है! यह अत्यंत ही चिंतनीय विषय है। भूजल गर्भ स्रोत तो हमने सिंचाई के लिए अंधाधुंध प्रयोग करके खत्म ही कर डाला है। यह सब पेयजल की उपलब्धता की दृष्टि से भयावह स्थिति है। इसके लिए सभी सरकारों, केंद्रीय प्राधिकरणों और वैश्विक संगठनों सहित प्रत्येक व्यक्ति को गंभीरता पूर्वक सोचना होगा और अहम फैसला लेना ही होगा। अन्यथा वह दिन दूर नहीं है, जब पानी पानी के लिए त्राहि त्राहि मच जाएगी। अंत में जल की महत्ता और आवश्यकता पर एक छोटी सी कविता आप सभी के समक्ष प्रस्तुत है……

“मैं जल हूँ”
मैं जल हूँ नीर-क्षीर
तेरे कल की सांस हूँ

जीवन अधीर
हर इक बूंद में
शबनम, ओस, बारिश में

अश्रु में खारा
रुधिर में बहता ज्वार
पसीनों में धारा

बादल बन घिरूँ
नदी बन बहता जाऊँ
मैं ही गूँजूँ

तालाब ठहरू
सागर गहरूँ
पोखर में सूखा दर्द

झीलों में नूर
हर ओर बस मैं
यत्र-तत्र सर्वत्र

अदृश्य दिशाओं में
तेरे भीतर-बाहर भी
मैं ही मैं हूँ

मानुष बचा ले
वरना सूख जाएगा
तेरा ही कल

मैंं जल हूं
अंतिम सच हूं
अंतिम ही सच हूं।।

सुरेश सिंह बैस शाश्वत

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